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Tuesday, October 19, 2021
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भारत, क्या एशिया की तीसरी बड़ी अर्थ- व्यवस्था ध्वस्त हो रही है ? और क्यों ?

इर्ना न्यूज़ एजेन्सी ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि भारत की अर्थ – व्यवस्था की जो दशा है उसे देखते हुए फिलहाल किसी तरफ से अच्छे संकेत नहीं मिल रहे हैं और आंकड़ों से पता चलता है कि मंदी, बड़ी तेज़ी से पैर पसार रही है और आशा की कोई किरण भी नहीं है।

        भारतीय वित्तमंत्रालय एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि अभी यह नहीं कहा जा सकता कि मंदी, पूरी तरह से आ चुकी है लेकिन अभी यह भी नहीं कहा जा सकता कि एशिया की तीसरी सब से बड़ी अर्थ- व्यवस्था, बजट के घाटे को पूरा कर पाएगी या नहीं।

     इसी दौरान आंकड़े बताते हैं कि जूलाई से सितंबर के दौरान, भारत में आर्थिक गतिविधियां कम हुई हैं और यह भी पता चलता है कि पिछले साल की तुलना में मंदी बढ़ गयी है।

     मंदी की वजह से अधिकांश क्षेत्रों में दूसरी छमाही में विकास की रफ्तार सुस्त पड़ी है। वाहन उत्पादन के क्षेत्र में पिछले साल की तुलना में 37 प्रतिशत कमी दर्ज की गयी है।

     दूसरी छमाही में उद्योग के लिए बैंक लोन में मात्र 2.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि पिछले साल यह वृद्धि 6.5 प्रतिशत थी। 13 लाख घर घर बिके ही नहीं, अक्तूबर सन 2019 में आयात में भारी गिरावट आयी है जिसका मतलब, भारत में मांग में कमी है। निर्यात में भी 2.21 प्रतिशत की कमी हुई है।

ट्रम्प सरकार ने भी भारत की अर्थ व्यवस्था को नुक़सान पहुंचाया है। 

भारत में मंदी की वजह क्या है?

      भारत में आर्थिक संकट पिछले साल आरंभ हुआ जिसकी वजह से लिक्विडिटी या तरलता की कमी हो गयी और निवेश खतरे में पड़ गया। दूसरी बड़ी वजह, मांग में कमी और अमरीका द्वारा भारत पर थोपा गया आर्थिक युद्ध है।  

     बहुत से विशेषज्ञ जीएसटी और नोटंबदी जैसे सुधारवादी क़दमों को भी तरलता में कमी का कारण मानते हैं जिनकी वजह से भरत में पारंपारिक व्यापार लगभग खत्म हो गया। भारत के हालात तो वजह बने ही उस पर अमरीका के फैसलों और पूरी दुनिया के हालात ने भी भारत की अर्थ व्यवस्था को प्रभावित किया है। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने गत जून में भारत से जीएसपी का दर्जा छीन लिया जिसकी वजह से भारत के हाथ से अमरीका के साथ तरजीही व्यापार का अवसर निकल गया जिसकी वजह से भारत को काफी नुक़सान हुआ।

     हालांकि भारत सरकार ने  अर्थ व्यवस्था को सुधारने के लिए कई क़दम उठाए हैं किंतु हालात से यह नहीं लगता कि अगले कुछ महीनों के दौरान भारतीय अर्थ व्यवस्था में बेहतरी नज़र आएगी। एसबीआई ने तीसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद के विकास दर पांच फीसद से नीचे बतायी है जबकि आईएमएफ ने विकास दर का अनुमान घटा कर 6.1 प्रतिशत कर दिया है जबकि पहले उसने 7 प्रतिशत का अनुमान लगाया था। 

साभार पार्सटूडे

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