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Sunday, October 17, 2021
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मोदी भारत के लोकतंत्र को ख़तरे में डालने के साथ ही देश की अर्थव्यवस्था को भी नुक़सान पहुंचा रहे हैं

रिपोर्ट – सज्जाद अली नायाणी

इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने अपने एक आर्टिकल में भारतारीय प्रधान मंत्री के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार की नीतियों को देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे के लिए घातक क़रार दिया है।

देश-विदेश – धारा 370 ख़त्म करके जम्मू-कश्मीर के लोगों पर धौंस जमाना, इस बहुल मुस्लिम क्षेत्र की जनसंख्या के अनुपात में बदलाव की योजना बनाना और असम समेत पूरे देश में करोड़ों मुस्लिम नागरिकों की नागरिकता छीनने की धमकी देना मोदी सरकार के नेतृत्व में भारतीय नौकरशाही द्वारा नस्लीय सफ़ाए का एक ऐसा घिनौना रूप है, जिसने दुनिया के कई लोगों के विवेक को झंझोड़ा है, लेकिन इसके बावजूद पश्चिमी दक्षिणपंथी राजनेता और व्यवसायी मोदी सरकार के बचाव में मैदान में हैं।

भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी भले ही लोकतंत्र के लिए बुरे हैं, लेकिन उनका दावा है कि उनका व्यापार-दर्शन अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है। लेकिन आर्थिक संकट ने उनके इस दावे की पोल खोल दी है। इसमें अब कोई संदेह नहीं है कि भारत की अर्थव्यवस्था बहुत ही बुरे दौर से गुज़र रही है।

पश्चिम के दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञ मोदी सरकार और बीजेपी का बचाव इसलिए करते हैं, क्योंकि बीजेपी ने जिस संगठन के गर्भ से जन्म लिया है वह यूरोपीय नाज़ीवाद और फासीवाद का आज भी सबसे बड़ा समर्थक है और उन्हीं के नक़्शे क़दम पर चलते हुए देश में अल्पसंख्यकों विशेष रूप से मुसलमानों को दुश्मन नम्बर वन मानता है और उनका नस्लीय सफ़ाया करना चाहता है।

वहीं पश्चिमी व्यवसायियों के लिए मोदी हालांकि लोकतंत्र के लिए ख़तरा हैं, लेकिन उनकी पूंजीवादी नीतियां उनके व्यवसाय के लिए लाभदायक हैं। उन्हें इससे भी कोई लेना-देना नहीं है कि मोदी के नेतृत्व में भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी से उतर रही है।

भारत की अर्थव्यवस्था जो पिछले वर्ष तक 8 प्रतिशत की दर से विकास कर रही थी, इस साल के हालिया तीन महीनों के दौरान गिरकर केवल 5 प्रतिशत रह गई है। विश्व अर्थव्यवस्था में मंदी के मद्देनज़र यह दर बहुत बुरी भी नहीं है, लेकिन भारत जैसे ग़रीब व बड़ी जनसंख्या वाले देश में ग़रीबी को कम करने और युवाओं को रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए इसे पर्याप्त क़रार नहीं दिया जा सकता।

भारत को आर्थिक संकट का सामना है और कई बैंकों और कंपनियों का दिवालिया निकल चुका है और कई अन्य दिवालिया होने की कगार पर हैं। बैंकों का 200 अरब डॉलर से अधिक देनदारों पर बक़ाया है जो वे या लेकर विदेशों को भाग गए हैं या अदा करने की स्थिति में नहीं हैं। सितम्बर तक पिछले 6 महीने में व्यवसायों के लिए वित्तपोषण के प्रवाह में 88 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है।   

बाज़ार में मांग पिछले कई वर्षों की तुलना में अपने सबसे निचले स्तर पर है। कारों और मोटरबाइकों की बिक्री में 20% या उससे अधिक की गिरावट आई है। केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों का संयुक्त राजकोषीय घाटा पहले से ही जीडीपी के 9 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। जीएसटी लागू होने के बावजूद, टैक्स वसूली अपेक्षा से काफ़ी कम हो रही है।

भारत की बढ़ती आर्थिक समस्याओं के बावजूद, सांप्रदायिक कार्ड खेलकर लोगों का ध्यान मूल समस्याओं से भटकाना निंदनीय है। स्थिति अभी निंयत्रण से बाहर नहीं है, इसलिए काश समय रहते हुए वे सही निष्कर्ष निकाल सकते और वास्वकित सुधारों के लिए गंभीर क़दम उठा सकते।

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