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Wednesday, October 20, 2021
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सऊदी तेल कंपनी पर हमला, भारत की बढ़ी चिंता, क्या मोदी सरकार ट्रम्प की मनमानी से कर सकेगी इंकार ?

रिपोर्ट – सज्जाद अली नायाणी

सऊदी अरब की ऑयल रिफ़ाइनरी पर यमनी सेना और स्वयंसेवी बलों द्वारा की गई जवाबी कार्यवाही के बाद पूरी दुनिया में तेल की क़ीमतों में काफ़ी वृद्धि देखने को मिल रही है। बीते कुछ दशकों में यह सबसे तेज़ उछाल है और इसने मध्यपूर्व में एक नए संघर्ष का ख़तरा भी पैदा कर दिया है।

विदेश – शनिवार 14 सितंबर को यमन की धरती से 10 ड्रोन एक साथ उड़े और सऊदी अरब के उन पाश्विक हमलों का मुंहतोड़ जवाब दिया जो वह अपने अरब और पश्चिमी सहयोगियों के साथ मिलकर लगभग पांच वर्षों से यमन पर कर रहा था। यमनी ड्रोन ने सऊदी अरब की सबसे बड़ी ऑयल रिफ़ाइनरी आराम्को को निशाना बनाया। इस जवाबी हमले के बाद तो पूरी दुनिया में हाहाकार मच गया।

इस हमले से सऊदी अरब के कुल उत्पादन और दुनिया की 5 प्रतिशत तेल आपूर्ति पर बुरा असर पड़ा। एक ओर जहां अमेरिका की मनमानी और दुनिया की ख़ामोशी के कारण पहले से ही तेल को लेकर आए दिन कठिनाईयां पेश आती रहती हैं, वहीं सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों पर हुए हमले के बाद इस परेशानी में दोगुनी वृद्धि हो गई है और इसका शिकार भारत भी हुआ है।

भारत क़रीब 83 प्रतिशत तेल आयात करता है। भारत विश्व में तेल के सबसे बड़े आयातकों में से एक है। भारत में ज़्यादातर कच्चा तेल और गैस ईरान, इराक़ और सऊदी अरब से आयात हती है। तेल का 10 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा भारत ईरान से आयात करता है। हालांकि, इस साल की शुरुआत में अमरीका द्वारा एकपक्षीय ढंग से परमाणु समझौते से अलग होने के बाद भारत पर दबाव बनाया कि वह ईरान से तेल ख़रीदना बंद कर दे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के दबाव के आगे भारत की मोदी सरकार ने घुटने टेकते हुए ईरान से तेल आयात मे कमी कर दी, जबकि ईरान तेल और गैस में भारत को सबसे अधिक छूट देता आया है। इस बीच भारत ने अमरीका जैसे दूसरे देशों से तेल आयात करना आरंभ किया, लेकिन ज़्यादा दामों पर।

इस बीच सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों पर हुए हालिया हमलों के बाद जहां दुनिया भर के उन देशों में चिंता बढ़ गई है जो सऊदी अरब से तेल आयात करते हैं वहीं भारत सरकार भी इन हमलों के बाद चिंतिति दिखाई दे रही है। भारत की सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपा के प्रवक्ता और ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि, “भारत की दो बड़ी चिंताएं हैं, पहली, हम मानते हैं कि सऊदी अरब एक बहुत ही विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता है, भारत, सऊदी अरब को दुनिया में सुरक्षित सप्लायर के तौर पर देखता रहा है।

लेकिन जिस तरह हालिया दिनों में उसके तेल प्रतिष्ठानों पर हमले हुए हैं, ऐसा लगने लगा है कि सऊदी के संयंत्र अब पहले की तरह सुरक्षित नहीं रहे हैं और इसने भारत जैसे दूसरे बड़े आयातकों को चिंतित कर दिया है।” नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि, “दूसरी बात यह है कि, भारत की अर्थव्यवस्था और यहां के लोग क़ीमतों को लेकर बहुत संवेदनशील रहते हैं, इसलिए आज क़ीमत को लेकर चिंता ज़्यादा है।”

भारत की दो तिहाई तेल की मांग इस क्षेत्र से पूरी होती है और अगर हालिया स्थति में किसी भी तरह का तनाव में और अधिक वृद्धि होती है तो निश्चित रूप से भारत पर उसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। अगर आप सबसे तेज़ी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं और उनकी आयातित तेल पर निर्भरता को देखें तो कोई भी देश आयात पर निर्भरता के मामले में भारत जैसी कमज़ोर स्थिति में नहीं है और यह सारी उथल-पुथल निश्चित तौर पर भारत पर असर डालेगी। यह अब इस पर निर्भर करेगा कि उत्पादन कब तक बाधित रहता है।

सऊदी अरब का कहना है कि संयंत्रों को ठीक करने में उसे कुछ दिन लगेंगे, लेकिन अगर और ज़्यादा वक़्त लगता है तो इससे तेल की क़ीमतों पर और असर पड़ेगा और हो सकता है इससे भारत में आयात की क़ीमत और बढ़ जाए। भारत की मोदी सरकार पहले ही अर्थव्यवस्था के मामले में बुरे दौर से गुज़र रही है और अगर तेल की क़ीमतें बढ़ती हैं तो भारत की मुश्किलें और अधिक बढ़ जाएंगी।

इस बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत अमेरिकी दबाव से बाहर निकलकर ईरान की ओर हाथ बढ़ाता है तो यह न केवल उसकी अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर होगा बल्कि स्वयं भारत की मोदी सरकार जो इस समय गिरती जीडीपी और कमज़ोर होती आर्थिक स्थिति से परेशान है उसे भी राहत की सांस मिलेगी।

जानकारों का कहना है कि ईरान से तेल आयात में भारत को हमेशा से काफ़ी आसानी रही है और इसका लाभ सरकार और इस देश की ऑयल कंपनियों के साथ-साथ भारत की जनता को भी मिलता है। इस मामले में ज़्यादातर टीकाकारों का मानना है कि, ईरान पर लगे पुराने प्रतिबंधों और हाल के प्रतिबंधों में काफ़ी अंतर है। पुराने प्रतिबंध बहुत से देशों ने मिल-जुल कर लगाए थे जबकि इस बार यूरोपीय संघ जैसे बड़े ब्लॉक इसमें शामिल नहीं हैं।

इस बार अमरीका का एक तरफ़ा प्रतिबंध है जिसको न संयुक्त राष्ट्र संघ मानने को तैयार है और न ही दुनिया के वह देश जो इस प्रयास में हैं कि कैसे अमेरिका की ग़ुलामी की ज़ंजीर को तोड़ा जा सके। भारत और ईरान जहां एक पुराने मित्र देश हैं वहीं इन दोनों देशों के बीच प्राचीन समय से व्यापारिक, सामरिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कच्चे तेल को ईरान से भारत लाने की क़ीमत दूसरे देशों के मुक़ाबले में काफ़ी कम है और अरब देशों के मुक़ाबले ईरान भुगतान के मामले में भारत को ज़्यादा समय-सीमा देता आया है।

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