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Tuesday, October 19, 2021
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आपकी अभिव्यक्ति – अनुशासन के नाम जुबान खोलने पर प्रतिबंधित सुरक्षा बलों की समस्याएं और सरकार के दायित्व पर विशेष – भोलानाथ मिश्र

वैसे मनुष्य जीवन में अनुशासन का बहुत महत्व होता है और हर क्षेत्र में अनुशासित रहने की सलाह दी जाती है।चाहे सरकारी अर्द्धसरकारी प्राइवेट लिमिटेड हो चाहे राजनैतिक दल या एनजीओ हो हर जगह अनुशासन तोड़ने पर दंड देने का प्रावधान होता है। इस सबके बावजूद सुरक्षा से जुड़े सरकारी क्षेत्र में जुड़े लोगों को अपनी समस्याओं एवं अन्याय के खिलाफ लामबंद अथवा संगठन बनाकर संघर्ष या धरना प्रदर्शन अनशन करने की लोकतांत्रिक छूट होती है।सुरक्षा से जुड़ी चाहे पुलिस पी. ए.सी. सीमा सुरक्षा बल सीआरपीएफ अथवा सेना हो इनमें अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है और इन्हें संगठित होकर सीधे अपनी मांगों जुल्मोसितम के खिलाफ जुबान खोलने की इजाजत आज से नहीं बल्कि आदिकाल से नहीं है।जब अन्य सरकारी विभागों आदि की तरह सुरक्षा से जुड़े विभागों को लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी बात कहने संगठन बनाने या विरोध करने का अधिकार नहीं है तो सरकार और विभागाध्यक्षों का फर्ज बनता है कि वह हमेशा सजग रहे ताकि इन बेजुबानों को जुल्म ज्यादती के खिलाफ जुबान खोलने अथवा विरोध करने की नौबत ही न आये।जब सरकार और विभागाध्यक्ष दोनों अपने बेजुबान मातहतों के प्रति उदासीन हो जाते हैं तो विभागीय लोगों में आक्रोश बढ़ने लगता है और कभी कभी सारी हदें एवं बंदिशें तोड़ देता है।अबतक पुलिस एवं पीएससी दोनों में बगावत हो चुकी है किन्तु दोनों बार उसे कुचल दिया गया है।यह सही है कि सुरक्षा बलों खासतौर पर सिविलियन पुलिस को रात दिन विपरीत परिस्थितियों में भी कार्य करना पड़ता है तथा पर्याप्त बल के अभाव में उन्हें घर जाकर अपने बाल बच्चों से मिलने का अवकाश तक मांग के अनुरूप नहीं मिल पाता है।जब कोई नागरिक घटना होती तो आँख मूँदकर पुलिस को दोषी ठहराया जाने लगता है। अधिकांश लोग पुलिस को कोसते हैं लेकिन आश्चर्य की बात है कि उसी से अपने जानमाल की सुरक्षा की अपेक्षा भी करते हैं। यह सही है कि इधर पुलिस का राजनैतिक महत्वाकांक्षा पूर्ति करने में इस्तेमाल होने से कुछ पुलिस कर्मियों को मुफ्त संरक्षण मिलने लगा है और अनुशासन की जगह निरंकुशता बढ़ने लगी है।आज के बदलते दौर में सिपाही भी सरकार तक अपनी पहुंच रखने लगा है और सिपाही दरोगा औकात में आ जाते हैं तो अपने राजनैतिक आका के जरिए कप्तान तक को हटवा देते हैं।हम अक्सर कहते हैं कि कोई विभाग अथवा समुदाय न तो पूरा का पूरा अच्छा होता है और न ही खराब होता है उसमें अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग रहते हैं। हर विभाग की तरह पुलिस में भी कुछ शराबी कबाबी भ्रष्ट तो कुछ शुद्ध शाकाहारी धार्मिक प्रवृत्ति के ईमानदार परिश्रमी बहादुर अकबाली भी मौजूद हैं जिनके बल पर पुलिस तमाम अपराधिक एवं समाजिक क्षेत्रों में विभाग के सिर को गौरान्वित कर रही है।कुछ लोग पुलिस में ऐसे भी हैं जो पुलिस विभाग के यादगार ऐतिहासिक इतिहास में काला धब्बा लगाकर अपराधिक कृत्य करने से बाज नहीं आते हैं। गत दिनों लखनऊ में सिपाही की गोली से हुयी एप्पल कम्पनी के मैनेजर विवेक तिवारी की मौत के बाद एक बार जनता से लेकर राजनेताओं समाजिक संगठन सभी पुलिस पर हमलावर हैं।हाँलाकि सरकार की सख्ती के चलते दोनों सिपाहियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करके उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया है।सरकार का भी मानना है कि कि यह इन्काउन्टर नहीं बल्कि सीधे हत्या का मामला है और मीडिया भी हाथ धोकर पुलिस को एकपक्षीय दोषी ठहराने में जुटी हुई है। पुलिस विभाग के कुछ लोगों को लग रहा है कि जेल भेजे गये सिपाही बेगुनाह हैं और यह उनके नहीं सिपाहियों के साथ अन्याय है। स्थिति इतनी विस्फोटक हो गई कि करीब पचास साल पहले वाली बगावत की घटना याद आने लगी और इस घटना के विरोध में प्रदेश के विभिन्न जिलों में सिपाहियों ने काली पट्टी बांधकर विरोध भी व्यक्त किया।इतना ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर भी पुलिस का दर्द और पक्ष जनता के सामने आने लगा था।सोशल मीडिया पर पोस्ट फोटो से ही इस बगावत का भंडाफोड़ हुआ तब सरकार एवं विभाग दोनों की निंद्रा टूटी और दोनों ने मिलकर आनन फानन विरोध एवं विरोधियों का दबा दिया। इस सिलसिले मेंं एक सिपाही इस्तीफा भी दे चुका है और दो बर्खास्त सिपाहियों को गिरफ्तार करके लखनऊ के कई कोतवाली निरीक्षकों आदि को निलम्बित अथवा हटा दिया गया है। सवाल गिरफ्तार कर लेने या निलंबित करने का नहीं है सवाल तो विश्वसनीयता बनाये रखने का है जो विभाग सरकार एवं आम नागरिकों के लिये हितकर होगा।अगर कुछ पुलिस वालों को लगता है कि दोनों सिपाहियों के साथ अन्याय हो रहा है तो इसकी जाँच सीबीआई से करा लेने में क्या हर्ज है? सब दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा।सरकार को भी ध्यान रखना होगा कि वह जनता और सरकार से जुड़े पुलिस ही नहीं बल्कि कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के सभी कर्मचारियों अधिकारियों के अभिभावक के रूप में होती है और दोनों के हितों की रक्षा करना उसका नैतिक दायित्व एवं धर्म बनता है।अनुशासन के नाम पर सरकारी सुरक्षातंत्र से बंधे सुरक्षाबलों में अनुशासन कायम रखने के लिए समय समय पर उनके दिल के दर्दों का निवारण सुनिश्चित करना होगा वरना कहा गया है कि उत्पीड़न की अंतिम सीमा बगावत को जन्म देती है। जिसका ट्रेलर दो दिन पहले थाना कोतवाली चौकियों के सिपाहियों ने हाथ में विरोध स्वरूप काली पट्टी बांधकर दिखाया है।दूबारा ऐसी स्थिति न पैदा हो यह सुनिश्चित करना सरकार एवं विभाग का काम है क्योंकि जनता जनार्दन एवं विभागीय पुलिस कर्मी दोनों उसी से न्याय एवं सुरक्षा की उम्मीद करते हैं। 

– वरिष्ठ पत्रकार / समाजसेवी

 

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