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Tuesday, October 19, 2021
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लोकतंत्र में मतदाताओं की भूमिका और निकाय चुनाव पर विशेष- – – – – – – – – – – – – – भोलानाथ मिश्रा

लोकतांत्रिक प्रणाली में मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।राजतंत्र में राजा रानी के पेट से पैदा होता था जबकि लोकतंत्र में राजा मतपेटी से पैदा होता है।लोकतंत्र का मतलब अपना देश, अपना राज और अपना कानून होता है। लोकतंत्र में मतदाता अपना प्रतिनिधि चुनता है जो उसकी इच्छा के अनुरूप राजपाट चलाता तथा कानून बनाता है।एक बार मतदाता जिसे चुनकर गद्दी पर बिठा देते हैं वह पांच साल के लिए बेताज बादशाह बन जाता है।लोकतंत्र प्रणाली इसलिए नहीं लागू की गयी थी कि मतदाताओं के अनुरूप काम न करके उन्हें जाति धर्म सम्प्रदाय के नाम पर बांटकर उनका मत ले लिया जाय। दुख इस बात का है कि महात्मा गांधी का लोकतंत्र उनके यहाँ से जाते ही उनके साथ ही चला गया।जो लोकतंत्र जिंदा भी था वह आज के राजनैतिक दौर में धीरे धीरे समाप्त होता जा रहा है।इस समय नगर निकायों के चुनाव हो रहें हैं और लोग अपनी अपनी फौज लिये मैदान में कूदने के लिये नामांकन पत्र दाखिल करने में लगे हैं।चुनावी सर्कस शुरू होने वाली पहली घंटी नामाकंन पत्र खरीदने जमा करने के साथ बज गयी है दूसरी घंटी नामांकन पत्रों की जांच और तीसरी घंटी चुनाव चिन्ह मिलने के साथ बज जायेगी और चुनावी सर्कस का खेल शुरू हो जायेगा। लोकतंत्र के इस चुनावी महासमर में जनता का नुमाइंदा बनने की इच्छा रखने वालों की वेशभूषा व बोली बानी बदल गयी है।इस बार नगर निकायों के चुनावों में राजनैतिक दल अपेक्षाकृत कुछ मतलब से ज्यादा ही रूचि ले रहे हैं और अपने सिंबल पर अपने प्रत्याशी मैदान में उतार रहें हैं।भाजपा सपा कांग्रेस बसपा सभी नगर निकायों के चुनाव को आगामी लोकसभा चुनावों का ट्रेलर मान रही हैं।भाजपा इस चुनाव में भी पिछले चुनाव की तस्वीर देखकर प्रत्याशियों का चयन अन्य दलों के प्रत्याशियों को देखकर सबसे अंत में घोषित करने की नीति अख्तियार किये हुए है जबकि हालात कभी भी किसी के भी हमेशा एक जैसे नहीं रहते हैं।सपा भी प्रदेश में अपने को भाजपा से कम नही आंक रही है और उसका मानना है कि अगर इस वक्त विधानसभा के चुनाव हो जाय तो उनकी पार्टी सत्ता में आ जायेगी।सपा अपने अधिकांश उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है और उसके प्रत्याशी दमखम के साथ नामांकन करने और मतदाताओं से जनसंपर्क करने में जुट गये हैं। मतदाता अभी मौनधारण किये उम्मीदवारों के मैदान में आने की राह देख रहा है। नगर पंचायत अध्यक्ष का चुनाव आजकल विधायक के बराबर हो गया है इसलिए जनता के बीच का कोई गरीब इस चुनाव को लड़ ही नही सकता है।करोड़ों रुपये दांव पर लगाये जाते हैं और जितने दिन चुनाव होता है उतने दिन फटा मैला कुर्ता व साधारण टूटी चप्पलें पहनना पड़ता है। जिस दरवाजे कोई नही जाता है उसके दरवाजे पर जाकर उसके बच्चे को गोदी में उठाना और फटे तंगहाल कपड़ों वाली उसकी औरत को प्रणाम करना पड़ता है। चुनाव शुरू होते ही पीछे चलने वालों और प्रचार करने वालों की भी व्यवस्था करनी पड़ती है। कुछ लोगों को अपने साथ जिंदाबाद करने के लिये लोगों को पांच सौ रूपये मजदूरी भी देनी पड़ती है। चुनाव आते ही मतदाताओं के एक वर्ग के चेहरे पर मुस्कान आ गयी है और वह मूंछ ऊपर करके मैदान में आ गया है।उन्हें रोजाना कम से कम तीन शीशी और तीन वक्त खाना नाश्ता बीड़ी सिगरेट पान मसाला व दोहरा की पुड़िया के साथ नकद भी चाहिए।मनरेगा के चलते चुनावी मजदूर अथवा कार्यकर्ता भी महंगे हो गये हैं।

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