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Wednesday, October 27, 2021
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क्या आप जानते है FIRऔर NCR में अंतर

कोई महत्वपूर्ण सामान जैसे Debit card, credit card, driving license, Aadhar card गुम हो जाने, आपसी झड़प, मारपीट या गाली-गलौच होने जैसे ही कई मामलों के समाधान के लिए पुलिस स्टेशन में शिकायत की जाती है।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर तरह की शिकायत के लिए के लिए एफआईआर दर्ज नहीं होती। कुछ मामलों में एनसीआर भी करनी होती है और कुछ मामलों में पुलिस शिकायत को अपने रजिस्टर में दर्ज़ कर जाँच करती है यानि की कुछ शिकायतों में न तो फिर न ही एनसीआर (NCR) कटी जाती है।

क्राइम के आधार पर पहले तय किया जाता है; कि वह किस कैटेगरी का है और उसी के मुताबिक, एफआईआर या एनसीआर करते हैं। यह केटेगरी दंड प्रक्रिया संहिता की प्रथम अनुसूची में प्रावधान है की कौन से अपराध एनसीआर होंगे

FIR और NCR में अंतर
अपराध को दो श्रेणी में विभाजित किया गया है संज्ञेय (कॉग्निजेबल) और असंज्ञेय (नॉन कॉग्निजेबल) अपराध।

संज्ञेय (कॉग्निजेबल) अपराध ( Cognizable Offence)

  • जो संगीन अपराध होते है वह संज्ञेय अपराध होता है यह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 (3) के अंतर्गत दर्ज की जाती है पुलिस Cognizable Offence में बिना वारंट गिरफ्तार कर सकती है तथा पुलिस को इसकी जाँच के लिए कोर्ट से अनुमति की जरुरत भी नहीं होती है । पुलिस स्वतः संज्ञान ले सकती है ।
    यह अपराध दो प्रकार को होता है|
  1. Bailable (जमानतीय) : जिन अपराधों को CrPC ,1973 की अनुसूची प्रथम में जमानतीय अपराध में वर्गीकृत किया गया है । ऐसे अपराधों में पुलिस जमानत दे सकती है जिन अपराधों को CrPC ,1973 की अनुसूची प्रथम में जमानतीय अपराध में वर्गीकृत किया गया है ।
  2. Non -Bailable (गैर जमानतीय ):जिन अपराधों को CrPC ,1973 की अनुसूची प्रथम में गैर जमानतीय अपराध में वर्गीकृत किया गया है । ऐसे अपराधों में पुलिस जमानत नहीं दे सकती है जिन अपराधों को CrPC ,1973 की अनुसूची प्रथम में जमानतीय अपराध में वर्गीकृत किया गया है । न्यायालय ही जमानत दे सकते है जिन अपराधों को CrPC ,1973 की अनुसूची प्रथम में जमानतीय अपराध में वर्गीकृत किया गया है ।
    सामानयतः 03 साल से अधिक की सजा वाले अपराध गैर जमानतीय अपराध होते है जिन अपराधों को CrPC ,1973 की अनुसूची प्रथम में जमानतीय अपराध में वर्गीकृत किया गया है ।
    असंज्ञेय (नॉन कॉग्निजेबल) ऑफेंस ( Non Cognizable Offence)
    -असंज्ञेय अपराध में सीधे तौर पर एफआईआर दर्ज किए जाने का प्रावधान नहीं है। ऐसे मामले में पुलिस को शिकायत दिए जाने के बाद पुलिस रोज़नामचा आम में एंट्री करती है और इस बारे में कोर्ट को अवगत करा दिया जाता है। एनसीआर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 155 के अंतर्गत दर्ज़ की जाती है पुलिस को ऐसे मामलों में बिना वारंट गिरफ्तार का अधिकार नहीं होता है न ही पुलिस कोर्ट की अनुमति के बिना कारवाही कर सकती है। पुलिस स्वतः संज्ञान नहीं ले सकती है ।
    किस तरह के मामलों में पुलिस आमतौर पर एनसीआर काटती है
    अगर किसी का मोबाइल गुम हो जाए या फिर चोरी हो गया हो तो उस मोबाइल का गलत इस्तेमाल भी हो सकता है। पर्स में मौजूद अहम दस्तावेज अथवा ड्राइविंग लाइसेंस डेबिट कार्ड क्रेडिट कार्ड आधार कार्ड आदि का भी गलत इस्तेमाल हो सकता है। इतना ही नहीं दोबारा ये दस्तावेज बनवाने में भी पुलिस रिपोर्ट की जरूरत होती है ऐसे में पुलिस को की गई शिकायत का काफी ज्यादा महत्व है। ऐसे मामले में तनिक भी लापरवाही ठीक नहीं होती और गायब हुए सामान के बारे में पुलिस को सूचना दिया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में आमतौर पर पुलिस सीधे तौर पर एफआईआर नहीं करती अगर किसी की मोबाइल चोरी हुई हो या फिर किसी ने लूट लिया हो तभी एफआईआर दर्ज होती है। लेकिन मोबाइल कहीं खो जाए या फिर गुम हो जाए तो पुलिस एनसीआर काटती है।
    पुलिस एनसीआर में किस तरह कारवाही करती है
    एनसीआर में पुलिस घटना के बारे में जिक्र करती है और उसकी एक कॉपी शिकायती को दिया जाता है। इसके बाद अगर उक्त मोबाइल या फिर गायब हुए किसी दस्तावेज का कोई भी शख्स गलत इस्तेमाल करता है तो एनसीआर की कॉपी के आधार पर अपना बचाव किया जा सकता है। ऐसे में एनसीआर की काफी ज्यादा अहमियत है। उन्होंने बताया कि एनसीआर की कॉपी पुलिस अधिकारी कोर्ट को भेजता है। साथ ही मामले की छानबीन के बाद अगर कोई क्लू न मिले तो पुलिस अनट्रेसेबल का रिपोर्ट दाखिल करती है लेकिन छानबीन के दौरान पुलिस अगर केस सुलझा ले और सामान की रिकवरी हो जाए तो एनसीआर की कॉपी के आधार पर वह सामान शिकायती को मिल सकता है।

Advocate vipin kumar Nigam

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