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Sunday, October 17, 2021
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वो ज़ुल्म करें, हम कुछ न करें ! हमें जवाब देने का भी अधिकार नहीं ? ज़माना बदल गया है – यमन नागरिकों का सवाल

विदेश – सऊदी अरब के दो तेल संयंत्रों पर शनिवार को हुए हमले के बाद से पूरे इलाक़े में तनाव की स्थिति बन गई है। इस जवाबी कार्यवाही को यमनी सेना और स्वयंसेवी बलों ने सऊदी गठबंधन के पाश्विक हमलों के जवाब में किया है।

लगभग पांच वर्षों से सऊदी अरब और उसके सहयोगी अरब देश अमेरिका और कुछ पश्चिमी देशों एवं इस्राईल की मदद से मध्यपूर्व के ग़रीब अरब देश यमन पर हर दिन बम बरसा रहे हैं। इन हमलों में अब तक हज़ारों आम नगारिकों की मौत हो चुकी है, मरने वालों में महिलाओं और बच्चों की संख्या ज़्यादा है, लाखों की संख्या में लोग घायल हैं और इसी तरह लाखों की संख्या में बेघर, लेकिन दुनिया तमाशाई बनी देख रही है और न केवल देख रही है बल्कि बेगुनाह यमनी नागरिकों के ख़ून में कहीं न कहीं उनका हाथ भी सना हुआ है। लेकिन जहां यह ग़रीब और अत्याचाग्रस्त देश इन पाश्विक हमलों का हलका सा उत्तर देता है तो यही कथित तौर पर मानवाधिकार के बड़े-बड़े दावे करने वाले शासन अतिक्रमणकारी और अत्याचारी देश के समर्थन में आगे आ जाते हैं।

यमनी सेना ने सऊदी अरब और उसके गठबंधन के पाश्विक हमलों के जवाब में शनिवार को जैसे ही सऊदी तेल कंपनी आराम्को की बक़ीक और हरीज़ आयल रिफ़ाइनरियों पर हमला किया वैसे ही अमेरिका सहित उसके समर्थक देश चीख़ पड़े। अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने तो यमनी सेना के उन दावों को ख़ारिज कर दिया और सीधे तौर पर ईरान को ज़िम्मेदार बताते हुए ट्विटर पर लिखा है कि ऐसे कोई ‘सबूत नहीं’ हैं कि ड्रोन यमन से आए थे। इस बीच पोम्पियो के दावे को ईरान ने खारिज कर दिया। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैय्यद अब्बास मुसवी ने कहा कि, “इस तरह के आरोप बेबुनियाद और बेमतलब हैं।” दूसरी ओर सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री के मुताबिक़ इस हमले की वजह से कच्चे तेल का उत्पादन प्रतिदिन 57 लाख बैरल तक घट गया है। विश्लेषकों की राय है कि इससे दुनिया भर में तेल के दाम पर भारी असर पड़ेगा।

फ़ार्स की खाड़ी देशों की कूटनीतिक हलचल पर नज़र रखने वाले कई विशेषज्ञों का कहना है कि मध्यपूर्व में ईरान की बढ़ती ताक़त और लगातार उसकी होती कूटनीतिक जीत सऊदी अरब को बिल्कुल रास नहीं आ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि रियाज़ को क्षेत्र में तेहरान का दबदबा कभी रास नहीं आता। राजनीतिक जानकार यमनी सेना और अंसारुल्लाह को ईरान की ओर से मदद किए जाने के सऊदी अरब के दावों पर भी सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं कि जहां एक ओर सऊदी अरब और उसके सहयोगी बार-बार ईरान पर यमनी सेना और स्वयंसेवी बलों की मदद का आरोप लगाते रहते हैं वहीं दूसरी ओर आज तक वह इस संबंध में ईरान के ख़िलाफ़ कोई सबूत पेश नहीं कर सके हैं।
दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं कि, “ईरान यमनी सेना और अंसारुल्लाह का समर्थन कर रहा है, यह बात केवल प्रोपैगैंडा है। उनका कहना है कि अभी तक वहां न एक भी ईरान का सैनिक देखा गया है, न ही ईरान निर्मित हथियार पाए गए हैं। पाशा कहते हैं कि सऊदी अरब की इजाज़त के बिना एक भी जहाज़ वहां जा नहीं सकता, हर तरफ़ नाकाबंदी है, हवाई अड्डे भी उन्हीं के निंयत्रण में हैं यहां तक कि यमनी घायल अपने इलाज के लिए किसी अन्य देश नहीं जा पा रहे हैं जिसके कारण लगातार मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है इसके बावजूद रियाज़ सरकार का ईरान पर इस तरह का आरोप लगाना हास्यस्पद है।”

अगर वास्ताविकता देखी जाए तो यमन में ईरान का कोई हस्तक्षेप नहीं है बल्कि स्वयं सऊदी अरब ने कुछ अरब देशों की मदद और अमेरिका एवं ज़ायोनी शासन के इशारे पर इस ग़रीब देश को अपने लाभ के लिए निशाना बना रखा है। यमन पर हमले के पीछे सऊदी अरब के साथ-साथ इन सभी के अपने हित हैं। सोमालिया में सैन्य ठिकाने नहीं बना सका अमरीका यमन को विकल्प के तौर पर देखता है। यमन की रणनीतिक स्थित भी इसकी अहमियत बढ़ा देती है। एके पाशा कहते हैं कि, “लाल सागर और हिंद महासागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाले जलडमरूमध्य पर यमन स्थित है। यह इलाक़ा बहुत महत्वपूर्ण है। यहां से दुनिया का दो तिहाई तेल गुज़रता है। एशिया से यूरोप और अमरीका जाने वाले जहाज़ भी जाते हैं। यह व्यापार और शिपिंग के लिए महत्वपूर्ण इलाक़ा है। यह शिपिंग का सबसे व्यस्त रूट है।”

यमन की जो स्थिति है वह काफ़ी भयावय है। हालात दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होते जा रहे हैं। वहां लोगों के पास खाने को नहीं है, बीमारी और महामारी फैल रही है, लोग मर रहे हैं। मानवाधिकारों का उल्लंघन खुले आम हो रहा है। कभी बारात पर बमबारी हो जाती है, कभी स्कूल और कभी अस्पताल के ऊपर बम गिराए जाते हैं। स्वयं संयुक्त राष्ट्र संघ का अनुमान है कि 2016 के बाद संघर्ष में वहां कम से कम 10 हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है जिसमें महिलाओं और बच्चों की संख्या सबसे अधिक है। ग़ैर-सरकारी एजेंसियों ने तो यमन में मरने वालों का आंकड़ा 70 हज़ार तक भी बताया है। जो ज़िंदा हैं वह जंग के ताप में झुलस रहे हैं। सऊदी अरब और उसके सहयोगियों के हर दिन बसाए जाने वाले बमों की वजह से यमन की पूरी आबादी कराह रही है, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। हां दुनिया सुनती है और चीखते भी है जब यही यमन जब इन अत्याचारियों और आक्रमणकारियों को ज़रा सा भी जवाब देता है तो हर ओर से चीख़-पुकार होने लगती है। तभी तो कहते हैं कि ज़माना बदल गया है।
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम….
वह क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।

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