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Tuesday, October 26, 2021
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संपादक की कलम से – आखिरकार ईवीएम देवता को साढ़े छः हजार करोड जनता की आवाज को सुनने को मजबूर होना पड़ा ?

हार्दिक, जिग्नेश, कल्पेश की तिकड़ी ने कांग्रेस को दी संजीवनी, और बीजेपी को 99 के फेर में उलझा दिया । 2019 के आम चुनाव को मध्ये नजर रखते हुये बीजेपी को आत्म मंथन ही नही आत्म चिन्तन की सख्त जरूरत, तो वहीं कांग्रेस को भी जमींनी सतह पर वार्ड स्तर पर संगठन को मजबूत करने की अत्यन्त आवश्यकता ?

गुजरात चुनाव के परिणामों को मध्ये नजर रखते हुये, इस बात को सिरे से नकारा नहीं जा सकता है, कि ईवीएम देवता आप पर सदैव के लिये मेहरबान नहीं होते रहेंगें, क्योंकि देवता को भी सभी के संकट और दुख हरने तथा समस्याओं को सुनने का दायित्व होता है। वो किसी एक मात्र के रक्षक या संरक्षक नहीं हो सकते, क्योंकि समान्य जनमानस उनके कृपा पात्र होते हैं जो अपने अपने कार्यों के अनुरुप कृपा दृष्टि व आशिर्वाद से अनुग्रहीत होते रहते हैं।

क्योंकि इस बार जो गुजरात के चुनाव में परिदृश्य सामने उभर कर आया है, वो इस बात के साफ संकेत हैं, कि हर समय ‘समय’आपके अनुकूल नहीं हो सकता, जहाँ देवता के सहारे हर चुनाव नहीं जीता जा सकता, वहीं हर चुनाव में तिकड़ी या दुकड़ी संजीवनी नहीं सवित हो सकती, जमींनी सतह पर किये गये अपने – अपने कार्यों के अनुरूप ही परिणाम परलक्षित होते हैं ।

आज के दौर की राजनीति के मायनें कुछ भी हों, उनका नजरिया भले ही कुछ भी हो सकता है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम बहुत अच्छे होंगें, ये कतई नहीं माना जा सकता है। जो जनहित या देशहित में श्रेयकर / लाभकर कतई नहीं है। क्योंकि कहीं न कहीं ये सूक्त सच सावित अवश्य ही होती हैं कि ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय’ ।

2014 के आम चुनाव के बाद से जो घटना चक्र देखने को मिल रहा है, ये उस पंक्ति को कहीं न कहीं चरिथार्त करते दिख रहे हैं, ये भी अतिस्योक्ति नहीं होगी कि जो आज शान्तचित्त हो उसे सहन या बर्दास्त कर रहे हैं, वो प्रतिशोध की अन्तरज्वाला से कुंठित नहीं हो रहे होगें ऐसा कतई नहीं माना जा सकता, और जब यही कुंठित विचारधारा जब प्रतिघात के रुप में परवर्तित होती है, जो देश और समाज के लिये घातक साबित होती है।

भले ही आज बीजेपी अपनी आत्मसंतुष्टी के लिये 99 सीटों को लेकर अपनी खुशी इज़हार करती नजर आ रही हो, लेकिन वो अपनी खिसकती हुई जमीन का चिन्तन और आत्मअध्यन अवश्य करेगी, क्योंकि जिस तरह राहुल गाँधी हार्दिक, जिग्नेश, और कल्पेश की तिगड़ी ने गुजरात में ही गुजरात मॉडल की हवा निकाली वो परिणाम में परिलक्षित हुआ।

भले ही देवता ने लाज बचा दी हो, लेकिन उसने ये साफ संकेत भी दे दिये हैं कि अब वो ज्यादा समय तक उसकी रक्षा करने में असमर्थ है, जिसका जीता जगता उदाहरण कांग्रेस + का 80 सीटों पर काबिज हो जाना । जिसमें काफी सीटों पर नेेक टू नेेक फाईट हुई, जहाँ वोटों की संख्या सैकड़े और हजार में रही, इस बार वो चमत्कार कम ही जगह में देखने को मिला जहाँ वोटों की संख्या बडी मार्जिन की रही हो।

इस बार बड़े-बड़े विश्लेषकों के द्वारा बीजेपी को दी गई जीत के हवा हवाई आकड़े भी धरासायी हो गये, यही नहीं बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जिन्होने 2014 के आम चुनाव हो या यूपी के विधानसभा के चुनाव के सटीक नतीजों की भविष्यवाणी की थी वो अपने ही गृह राज्य की जनता को आंकने में विफल हो गये।

इतना ही नहीं जहाँ प्रचार प्रसार के माध्यम का जबरदस्त उपयोग / प्रयोग किया गया, यही नहीं सरकार ने अपने पूरे लावलस्कर के साथ रात दिन एक कर डाला हो, जहाँ देश के मुखिया को अपने ही गृह राज्य में मंचो से चीख-चीखकर ये तक याद दिलाना पड़ा हो कि उनके राज्य के व्यक्ति जो देश का मुखिया है आज उसकी अस्मत दांव पर लगी है उसे भला बुरा कहा गया है। बावजूद उसके दहाई का आकड़ा भी पार न हो, ये विचार करने योग्य है कि नहीं, सायद इस पर विचार अवश्य ही करने की आवश्ययकता है।

वहीं कांग्रेस को इस बात पर गौर करना पड़ेगा की 22 वर्षों की एंटी इनकम्बेंसी का उसे लाभ लेने में कहाँ चूक हो गई, तो सायद ये गलत न होगा कि वो सूरत, बडोदरा जैसे कुछ जगहों पर अपने आपको आस्वत समझ रही थी, कि नोटबंन्दी, जीएसटी के सहारे यहाँ उसकी नइया पार हो जायेगी, और हो भी जाती । लेकिन एक भी सीट हाँसिल नहीं कर पायी, ऐसी क्या वजह थी जो सीट वो जीत में बदल सकती थी, वो वैसा कुछ कर नहीं पायी?

जो सत्ता की जीत उसके मोहाने तक आ चुकी थी, वो उससे कैसे दूर हो गई ? क्या हार्दिक द्वारा अघिरोपित आरोप कि जो सीट बीजेपी 300 वोटों से हार रही थी वही सीट रीकाउंटिंग में 6000 वोटों के साथ जीत में कैसे परिवर्तित हो गये ? तो ये साफ हो जाता है कि देवता कहीं न कहीं मेहरबान तो अवश्य हुये हैं ?

– रवि जी. निगम ( संपादक – ‘मानवाधिकार अभिव्यक्ति’ )

 

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